पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी/ऊर्जा
संदर्भ
- नाभिकीय संलयन अनुसंधान में हालिया प्रगति ने संलयन ऊर्जा में रुचि को पुनः बढ़ाया है। विशेष रूप से टोकामक के माध्यम से प्लाज़्मा परिरोध के क्षेत्र में रुचि बढ़ी है।
टोकामक के बारे में
- टोकामक एक उपकरण (प्रायोगिक संलयन रिएक्टर) है, जो अत्यधिक गर्म प्लाज़्मा को टोरॉयडल (डोनट के आकार के) निर्वात कक्ष के अंदर सीमित रखने के लिए चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करता है।
- उत्पत्ति: इसका विकास 1950 के दशक के प्रारंभ में सोवियत संघ में मुख्य रूप से भौतिकविदों इगोर टैम और आंद्रेई सखारोव द्वारा किया गया था।
- अर्थ: टोकामक शब्द रूसी भाषा के एक संक्षिप्त रूप से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘चुंबकीय कुंडलियों से युक्त टोरॉयडल कक्ष’।
- प्लाज़्मा: पदार्थ की चौथी अवस्था प्लाज़्मा है, जो मुक्त इलेक्ट्रॉनों और धनावेशित आयनों से मिलकर बना होता है। इसे किसी गैस को अत्यधिक उच्च तापमान तक गर्म करके तैयार किया जाता है।
टोकामक किस प्रकार कार्य करता है?
- अत्यधिक गर्म प्लाज़्मा का निर्माण: हाइड्रोजन के समस्थानिकों, मुख्यतः ड्यूटेरियम और ट्रिटियम को लगभग 150 मिलियन °C तापमान तक गर्म किया जाता है।
- इस तापमान पर इनके नाभिक स्थिरवैद्युत प्रतिकर्षण को पार करके नाभिकीय संलयन कर सकते हैं।
- चुंबकीय क्षेत्रों के माध्यम से परिरोध: चूँकि कोई भी भौतिक पदार्थ प्लाज़्मा के अत्यधिक उच्च तापमान को सहन नहीं कर सकता, इसलिए टोकामक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करके इसे रिएक्टर की दीवारों से दूर रखता है।
- बाहरी चुंबकीय कुंडलियाँ टोरॉयडल कक्ष के चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती हैं, जबकि केंद्रीय सोलनॉइड द्वारा प्लाज़्मा में प्रेरित विद्युत धारा दूसरा चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करती है।
- इन चुंबकीय क्षेत्रों की पारस्परिक क्रिया से कुंडलाकार चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ उत्पन्न होती हैं, जो प्लाज़्मा को सीमित रखने और कणों की हानि को न्यूनतम करने में सहायता करती हैं।
- नाभिकीय संलयन अभिक्रिया: ड्यूटेरियम और ट्रिटियम के नाभिक आपस में मिलकर हीलियम एवं एक उच्च-ऊर्जा न्यूट्रॉन का निर्माण करते हैं तथा ऊर्जा मुक्त करते हैं।

विद्युत का उत्पादन किस प्रकार होता है?
- ऊर्जा का उत्सर्जन: ड्यूटेरियम-ट्रिटियम संलयन के दौरान मुक्त होने वाली ऊर्जा का लगभग 80% भाग न्यूट्रॉन द्वारा तथा 20% भाग हीलियम नाभिक (अल्फा कणों) द्वारा वहन किया जाता है।
- ऊष्मा का उत्पादन: उच्च-ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन आसपास के आवरण (ब्लैंकेट) से टकराते हैं और अपनी ऊर्जा ऊष्मा के रूप में उसमें स्थानांतरित कर देते हैं।
- ट्रिटियम का उत्पादन: इस आवरण में लिथियम होता है, जो न्यूट्रॉन के साथ अभिक्रिया करके ट्रिटियम उत्पन्न करता है। इससे रिएक्टर के ईंधन की पुनःपूर्ति में सहायता मिलती है।
- विद्युत उत्पादन: एक शीतलक ऊष्मा को भाप उत्पादन प्रणाली तक पहुँचाता है, जो टर्बाइनों को चलाकर विद्युत उत्पन्न करती है।
अब तक टोकामक ऊर्जा का उत्पादन क्यों नहीं कर पाए हैं?
- अत्यधिक तापमान की आवश्यकता: 100 मिलियन °C से अधिक तापमान पर प्लाज़्मा को बनाए रखना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है।
- प्लाज़्मा की अस्थिरता: प्लाज़्मा में अस्थिरताएँ उत्पन्न हो सकती हैं, जिनसे ऊर्जा और कणों की हानि होती है तथा परिरोध प्रक्रिया बाधित होती है।
- पदार्थ संबंधी सीमाएँ: रिएक्टर के संपर्क में आने वाले घटकों को तीव्र ऊष्मा, विकिरण और न्यूट्रॉन की बमबारी सहन करनी पड़ती है।
- ट्रिटियम की उपलब्धता: ट्रिटियम दुर्लभ और रेडियोधर्मी है। इसके लिए विश्वसनीय उत्पादन तथा ईंधन प्रबंधन प्रणालियों की आवश्यकता होती है।
- उच्च लागत: संलयन रिएक्टरों के निर्माण और संचालन के लिए उन्नत पदार्थों, अतिचालक चुंबकों तथा परिष्कृत नियंत्रण प्रणालियों की आवश्यकता होती है।
टोकामक प्रौद्योगिकी में प्रमुख विकास
- अंतरराष्ट्रीय ताप-नाभिकीय प्रायोगिक रिएक्टर (ITER): यह सात सदस्यों के बीच एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सहयोग परियोजना है। इसके सदस्य चीन, यूरोपीय संघ, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं।
- फ्रांस के कदारेश में स्थित इस परियोजना का उद्देश्य संलयन ऊर्जा की वैज्ञानिक और तकनीकी व्यवहार्यता प्रदर्शित करना है।
- इसे 50 MW की बाहरी प्लाज़्मा तापन शक्ति का उपयोग करके 500 MW संलयन ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए अभिकल्पित किया गया है। इसका संलयन ऊर्जा लाभ गुणांक (Q) 10 है।
- संशोधित आधारभूत योजना के अनुसार, ड्यूटेरियम-ट्रिटियम परिचालन वर्ष 2039 में शुरू करने की योजना है।
- चीन का EAST टोकामक: चीन के प्रायोगिक उन्नत अतिचालक टोकामक (EAST) ने वर्ष 2025 में 1,066 सेकंड तक उच्च-परिरोध वाला प्लाज़्मा बनाए रखा।
- – हालाँकि, EAST अब तक शुद्ध ऊर्जा उत्पादन प्राप्त नहीं कर पाया है।
टोकामक अनुसंधान में भारत की प्रगति
- भारत की दो प्रमुख टोकामक मशीनें गांधीनगर स्थित प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान (IPR) में हैं।
- आदित्य (ADITYA): भारत के प्रथम टोकामक ने वर्ष 1989 में कार्य करना शुरू किया था। बाद में इसका पुनर्निर्माण करके इसे ADITYA-U के रूप में विकसित किया गया, जिसने वर्ष 2017 में पुनः परिचालन शुरू किया।
- SST-1: स्टेडी स्टेट सुपरकंडक्टिंग टोकामक (SST-1) ने वर्ष 2013 में अपना प्रथम प्लाज़्मा उत्पन्न किया। इसमें अतिचालक चुंबकों का उपयोग किया जाता है।
- प्रज्ञा (PRAGYA): बेंगलुरु स्थित प्रानोस फ्यूजन द्वारा प्रस्तुत एक प्रायोगिक कॉम्पैक्ट टोकामक है। इसका उद्देश्य प्लाज़्मा नियंत्रण और चुंबकीय परिरोध के क्षेत्र में क्षमताओं का विकास करना है।
- ITER में भागीदारी: भारत ITER का सदस्य है और कई विशिष्ट रिएक्टर घटकों के विकास एवं आपूर्ति के माध्यम से इसमें योगदान देता है।
टोकामक तकनीक के विकल्प
| प्रौद्योगिकी | प्रमुख विशेषताएँ | उदाहरण |
| स्टेलरेटर | बड़े प्लाज़्मा विद्युत प्रवाह पर निर्भर हुए बिना प्लाज़्मा को सीमित रखने के लिए जटिल बाहरी चुंबकीय कुंडलियों का उपयोग करता है। | वेंडेलस्टीन 7-X, जर्मनी |
| जड़त्वीय परिरोध संलयन | संलयन अभिक्रिया शुरू करने के लिए शक्तिशाली लेज़र या कण-पुंजों का उपयोग करके एक छोटे ईंधन पेलेट को संपीड़ित किया जाता है। | राष्ट्रीय प्रज्वलन सुविधा , अमेरिका |
| चुंबकीय दर्पण | प्लाज़्मा को सीमित रखने के लिए चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करता है। इसके सिरों पर अधिक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र आवेशित कणों को वापस परावर्तित करते हैं। | चुंबकीय दर्पण संलयन प्रयोग |
निष्कर्ष
- टोकामक प्रौद्योगिकी नियंत्रित नाभिकीय संलयन की दिशा में एक प्रमुख मार्ग का प्रतिनिधित्व करती है।
- हालाँकि, संलयन को स्वच्छ ऊर्जा के व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य स्रोत के रूप में विकसित करने से पहले स्थिर प्लाज़्मा परिरोध, सतत ईंधन आपूर्ति और समग्र ऊर्जा संतुलन का धनात्मक होना सुनिश्चित करना आवश्यक है।
स्रोत: TH
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